मानवीय सम्बन्धो में सामंजस्य
दूसरो के साथ सामंजस्य की शुरुआत अपने ही स्वरूप से होती है। जैसा शेक्सपियर ने कहा था ,"अगर अगर तुम अपने स्वरूप के प्रति सच्चे रहोगे ,तो जिस तरह दिन के बाद रात आती है ,उसी तरह यह भी होगा की तुम किसी भी व्यक्ति के प्रति झूठे नहीं रहोगे। "
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